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शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

सागर

मैं तेरे किनारों पर
रेत की तरह बिखरा पड़ा हूँ
मेरा समुंदर
मुझे अपनाने से इनकार कर चुका है
मैं उसके सामने रोया
गिड़गिडाया
मैंने कहा
मुझे अपना वजूद तो देदे मेरे सागर
मुझे तू सीप बना
या मोती बना
या तेरे अंदर रहने वाली एक मछली बना ले
मुझे तू तेरे अंदर घुले हुए नमक का एक रेशा बना ले
मुझे यूँ किनारों पर तड़पते हुए न छोड़ ए सागर
मुझे तू अपना बना ले

मगर मेरा सागर बहुत हठी है
वो मुझे अपने सामने टूटकर बिखरते हुए देखना चाहता है
वो मुझे अपनी लहरों के जरिये
कभी कभी
मेरे पास आकर
और फिर असहाय सा छोड़ कर
दूर चला जाता है
और मैं यहाँ उसके किनारों पर
हतप्रभ
हताश
ये खेल देखता हूँ
हर रोज़
हर पल
और अपना किरदार निभाता हूँ
पूरी ईमानदारी से
उसकी लहरें जब हाथ बढाती है तो मैं भी
खुश होकर
बढ़ देता हूँ उसकी ओर
पर अगले ही पल
खीच लेता है वो अपने हाथ
और हँसता है अपनी क्रूर विजयी हंसी
और मैं हतप्रभ सा वही सिमट कर
खड़ा रह जाता हूँ

ए सागर
कभी तो एक ऐसी लहर भेज
कि मैं तेरी गहरारियो तक पहुच सकूँ
तुझे पा सकूँ
तुझे अपना सकूँ
तुझमे समा सकूँ
तेरे कुछ राज मैं जानूं
और कुछ अपने तुझे बता सकूँ
ए सागर
कभी तो एक लहर ऐसी भेज
मुझे ये अपने किनारों पे
निर्वासन की सजा मत दे
मैं बहुत दूर से चलकर तेरे पास आया हूँ
मेरा ये सफ़र अधूरा न रहे

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