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शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

कुछ सवाल


कुछ सवाल खड़े हैं अनसुलझे से
ट्रैफिक की लाल बत्ती पर थामे हुए
पथराई आंखों पर आंसू जैसे जमे हुए
कुछ सवाल खड़े हैं
साइन बोर्ड पर लगे इश्तिहारों से झांकते हुए
फुटपाथ पर बैठे भिखारी की तरह धुएँ को फांकते हुए
कुछ सवाल खड़े हैं
कुछ खड़े हैं इन्तेजार की लम्बी लाइन में
कुछ बैठ गए हैं थक कर छाया का रुख किए हुए
कुछ लगा रहे हैं नारे जवाबों के लिए
कुछ खामोशी से सब्र का बाँध थामे हुए
कुछ चढ़ उतर रहे हैं सीडियां बेचैनी से
कुछ बने हुए हैं उनकी सीडियां दर्द पीते हुए
कुछ खड़े हुए हैं दुकानों के अन्दर भीगने के डर से
कुछ जल्द से जल्द घर पहुचने को दौड़ते हुए
कुछ दिख जाते हैं आँखे मिलाते आईने में
कुछ अपने ही जवाबों से बचकर नजरें झुकाए हुए
कुछ दिन भर के काम से थक कर निढाल हो लिए
कुछ लगे हुए हैं कागज़ कलम लिए अपने जवाब ख़ुद लिखते हुए
कुछ फुटपाथ पर पड़े हुए जी रहे हैं अर्थहीन सा जीवन
कुछ बीच सड़क पर सरपट भागते अचानक मरते हुए
कुछ सड़क से काटकर जाती अँधेरी गली में खो जाते हैं
कुछ रौशनी में धब्बे नुमा परछाई की तरह तैरते हुए
जिधर भी नजर जाती है सिर्फ़ सवाल दिखायी देते हैं
पर सब के सब बगैर जवाबों के समय की धार पर अटके हुए...............

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