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मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

अलविदा

अगर चलता वक़्त
पीछे की ओर
तो समेट लेते
छूटी यादें
बिसरे मित्र
कुछ पहले पहल
कुछ आखिरी लफ्ज़
अचंभित निराशायें
प्रफ्फुलित मुलाकातें
फिसलती फुरसतें
रूठती बरसातें
सिकुड़ते दिन
बेमतलब बातें
तय किये सफ़र
सोयी हुयी सहर
भागती दोपहरें
रूकती शामें
टूटते तारे
बजती तारें
खुलती सड़कें
बंद दरवाजे
कागजों में बसती स्याही
बक्सों में बंद ज़िन्दगी
पुराने शिकवे
झड़ते फूल सेमल के
घुमावदार सीड़ियाँ
अंतहीन सड़कें
घायल स्वप्न
ठंडी पड़ी योजनायें
फिसलती उम्मीदें
उफान पर हौसले
वक़्त हुआ
कहने का
तुमको अलविदा
नहीं कह सकते
कि फिर मिलेंगे|

शनिवार, 28 दिसंबर 2013

ज़िन्दगी सड़कों पर खडी

दिन की कमीज में पैबंद लगे
रात की चादर कुछ छोटी पड़ गयी
उसने नजर फेर ली
मैंने न देखने का फैसला किया
उसने ज़ुबान पर ताले लगा लिए
मैंने आवाज को दबा दिया
ज़िन्दगी सड़कों पर खडी
नंगी धूप में
बचपन बेचती रही|

मौसम जब सख्त हुआ और हवा के रुख बदले
जलती धरती पैरो की नरमी खा गयी
उसने हाथ झटक लिए
मैंने कदमों की चाल बढा दी
उसने दरवाजे बंद कर लिए
मैंने रास्ता बदल लिया
ज़िन्दगी सडकों पर खड़ी
नंगी धूप में
बचपन बेचती रही|

चौराहे पर ज़िन्दगी बदस्तूर चलती रही
एक इमारत महीनों बाद बनकर खड़ी हो गयी
उसने हक की बात न की
मैंने लफ़्ज़ों को समेट लिया
उसने किस्मत को कोस दिया
मैंने हाथों को बढ़ने से रोक लिया
ज़िन्दगी सडकों पर खड़ी
नंगी धूप में
बचपन बेचती रही|