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बुधवार, 19 दिसंबर 2012

तुम महा-मानव नहीं

तुम महा-मानव हो
तुम सब कुछ हासिल कर सकते हो
यही सोच कर तुमने कदम बढाए थे
एक चीटी को कुचल देने के लिए
पर वो चीटी नहीं थी
और तुम महा-मानव नहीं
तुम्हे शायद इसका कभी पश्चाताप भी नहीं होगा
पर वो फिर कभी ज़िंदा ना हो पायेगी

मंगलवार, 20 नवंबर 2012

मेरी नीले तिरपाल की झोपडी के पीछे

सरकार जहां आज आपकी चमचमाती गाड़ियां दौड़ा करती हैं

वहाँ मैं अपनी जिंदगी की छोटी छोटी खुशियों की खेती करता था

और वहाँ एक दिन मेरे खेत लहलहाया करते थे

अब मैं रहता हूँ एक झुग्गी झोपडी वाली बस्ती में

जहां शहर की सड़कें मुड़कर संकरी गलियों में तब्दील हो जाती हैं

और एक नाला बहता है मेरी नीले तिरपाल की झोपडी के पीछे

जिसमे पानी लिजलिजाता है बिलकुल इस काली सड़क के रंग का

आपकी गाडी को धोता हूँ मैं एक घंटे रोजाना

पाइप से निकलती सफ़ेद तेज़ धार से

मेरी पत्नी रोज तीन घंटे इन्तेजार की कतार में खड़ी होकर

पीले रंग का पानी भरकर लाती है

जिससे मेरे परिवार में खाना बनता है

जो ये एक अकेला नीम का पेड़ देख रहे हैं सड़क के किनारे

इस पेड़ के छाया में बैठ कर

मैं कभी सुकून से रोटी प्याज खा लेता था

अब मैं इस नीम के पेड़ की हवा को याद करता हूँ

क्यूँकि मेरी झोपडी में पीछे बहते नाले से सडाँध आती है।

बुधवार, 14 नवंबर 2012

शाम के झुटपुटे में

शाम के झुटपुटे में बैठा हुआ
चाय की कुछ चुसकियाँ लेता हुआ
मैं सोचता हूँ तुम्हें
तुम्हारा अक्स सामने गुजरती छाया सा
मैं चाय नीचे रखता हूँ
और चल देता हूँ
तुम्हारे पीछे पीछे|

रविवार, 30 सितंबर 2012

लोग आ रहे हैं...

ये कहाँ से इतने लोग चले आ रहे हैं
सरों पर गठरियाँ उठाये
न जाने कहाँ से लोग चले आ रहे हैं
औरतें
छोटी, बड़ी और बूढी
और मर्द भी
कुछ आगे कुछ पीछे
कुछ साथ में
और बच्चे
कतारों में लगे
न जाने कहाँ से लोग
चले आ रहे हैं
कुछ उठाये हुए हैं झंडे
कुछ हाथों में बैनर लिए आ रहे हैं
आँखों में कुछ उदासी
एक शिकायत
तो कुछ जोश लिए आ रहे हैं
अपनी जमीनों से दूर
अपनी जमीनों का हक पाने
अविरल पानी से बहते
जाने कहाँ कहाँ से लोग चले आ रहे हैं
कितने दिनों के चलते चलते
कुछ थके कुछ हारे फिर भी चलते
कुछ खाने का सामान साथ लिए
कितने दिनों के घर से निकले
जलते हुए गले
जलते हुए पैरों को आगे बढ़ाते
जलते हुए सपनों के सहारे
हज़ारों लोग
बस इसी दिशा में
बढे आ रहे हैं...

बुधवार, 19 सितंबर 2012

दस्तक दिए बगैर चला आता है कोई

मेरे घर के दरवाजे पर कोई
दस्तक दिए बगैर चला आता है
फेंकता है कुछ सामान इधर उधर
और खाली दीवारों को घूरता है देर तक

मेरी मेज पर बिखरी किताबों को
उलट पलट कर
ढूंढता है कुछ कोई
मेरी एक आधी पढ़ी किताब को खोल कर
उसे वहीँ बीच से पढने लगता है

मेरी खिड़की से बाहर झाँक रहा है कोई
बारिश में भीगे हवा के झोंके
उसके चेहरे को थपकियाँ देते हैं
गम सुम बूंदों की खुशबू को समेटने को
उसने अपनी बाहें फैला ली हैं

मेरे बिस्तर पर लेटा है
बेसुध सा सोया कोई
मैं उसके थके चेहरे पर खिची लकीरें पढता हूँ
माथे की सिलवटों से शिकन छांटता हूँ

मेरे आईने से देखता है मेरी आँखों में कोई
मैं उस अनजान चेहरे को पहचानने की कोशिश में
अपनी उँगलियाँ आईने में बने अक्स पर फेरता हूँ
वो मैं ही हूँ

बुधवार, 12 सितंबर 2012

न्यूक्लीयर विष

खबर है
सागर मंथन की कल फिर से
एक छोटे से गाँव में बसने वाले
साधारण जन
क्या मथ पाएंगे अमृत
या सागर उगलेगा
न्यूक्लीयर विष
और तहस नहस कर देगा
लोगों के लिए
लोगों के द्वारा
लोगों का
कहा जाने वाला लोकतंत्र!!!

बुधवार, 5 सितंबर 2012

आखिरी मुलाक़ात

देखा था उसे आखिरी बार
एक नदी के किनारे पर खड़े हुए
एक महानगर में बहती हुयी नदी
अपने अस्तित्व को बचाती
जूझती नदी
जो पहुची थी यहाँ
न जाने कितने पहाड़ों को पार करती
एक गूंज थी उसमे
जब वो पहुची थी यहाँ कलकल करती हुयी
पर शहर की सडको से गुजरकर
उसकी हवा में साँसे लेकर
उसका दम घुटने लगा
जो कारवां सागर तक जाना था
वो बीच सफ़र में दम तोड़ने लगा
उसी नदी के किनारे पर
खड़े हुए देखा था उसे आखिरी बार

मैंने जब आगे बढकर
उसके कंधे पर हाथ रखा
चोंक कर देखा था उसने पलटकर
उसकी आँखों में उस मरती हुयी नदी की
छाया बसी थी
जिसे देख कर दहशत सी होने लगी
मेरे कुछ कहने से पहले ही
वो बोल पड़ी
तुम्हे यहाँ नहीं आना था
और ये कहते हुए उसकी आँखे
सुदूर आसमान में
बिखरे बादलों के एक टुकड़े पर जाकर रुक गयी
फिर उसने कुछ कहा
और कहते कहते वो मुझसे दूर चलती गयी
हम दोनों कितने एक जैसे लगते है न
ये नदी और मैं
अपने अंदर सब कुछ समेटते हुए
बस हम आगे बढते रहे
हम दोनों
पर अब लगता है जैसे
साहस नहीं रहा
ये हवाएं दम क्यूँ घोटने लगी हैं
हम अब अतीत की छाया बन कर रह गए है
अपने अवसान की ओर अग्रसर हम दोनों
एक ही अंत की ओर बढ रहे हैं
उसकी आँखों में एक वहशत सी थी
मैंने उसे पुकारा फिर से
पर वो नहीं रुकी
बस वही सुने थे
उसके आखिरी शब्द
और आखिरी बार उसे वही देखा था....

रविवार, 19 अगस्त 2012

आसमानी रंग

जब मैं बहुत छोटा सा था
मेरी माँ ने एक बार
आसमान की और इशारा कर दिखाया था
कि उसके आँचल का रंग था
आसमान के रंग जैसा ही
तब मैं समझा था
कि मेरी माँ के आँचल का एक टुकडा
ऊपर उड़कर आसमान बन गया है

शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

बुखार

रात उसे तेज़ बुखार चढ़ा
शरीर का हर हिस्सा चरमरा उठा
तब उसे घर याद आया
माँ की थपकियाँ याद आई
रात भर नींद से खाली
फिक्र भरी उसकी आँखें याद आई
उसने सभी खिड़कियाँ बंद कर ली
परदे भी उसने खींच लिए
की कहीं से कोई रौशनी न आ जाए
सारी बत्तियां बुझा कर
रात भर वो गरम साँसे उडेलता रहा अपने तकिये पर
रात गुजरी
पर सुबह का कहीं अता पता नजर न आया
कमरे का अन्धेरा चुप चाप उसे देखता रहा
सूरज ने कोशिश की खिड़की से झाँकने की
तो उसने मुंह फेर लिया
दिन चढ़ा
बुखार भी चढ़ा रहा
कुछ भूख चढी
पर नींद का खुमार भी चढ़ा रहा
वो याद करता रहा
गुजरे दिन, वाकये, शहर और लोग
एक वीरान पहाड़
बुखार में तपते कुछ लफ्ज़
गूंजते हैं घाटी में
कुछ पल
फिर सन्नाटा साँय साँय करता है
एक छाया पलटकर पीछे देखती है
दूसरी छाया को
लफ्ज़ गूंजते है फिर
और कुछ कहकहे सुनाई देते है
सन्नाटा फिर साँय साँय करता सुनाई पड़ता है
वो बुखार में तड़पता सन्नाटे की घुटन से बचता हुआ
अपने कानो पर हाथ रखता है
रात पसीने से तरबतर बदन
वो अचानक घबरा कर उठ बैठा
बुखार न था
पर खुमारी अब भी थी...

रविवार, 12 अगस्त 2012

खिड़की के इस पार

एक खिड़की है...
और बाहर आधा कटा आसमान है...
कुछ दरख़्त है...
कुछ दीवारें...
कुछ छतें...
खिड़की के इस पार दो आँखें हैं...
एक फ़ोन...
एक इंतज़ार...
एक कप काफ्फी...
और एक आधी पढ़ी किताब है...

मंगलवार, 7 अगस्त 2012

एक ख़याल है

एक ख़याल है
जो सुबह को बड़ी
मुश्किलों से जागता है
चादर से फिर वो अपनी
कुछ सपनो को झाड़ता है
अनमनाया सा
उठ कर चल देता है फिर
बाहर की दुनिया में
हज़ारों की भीड़ में धक्के खाता
नींद भरी उबासियाँ भरता हुआ
कभी खडा होता कभी बैठता
कभी चलता कभी दौड़ता
पहुचता है कभी वक़्त पर
तो कभी देर से
एक दुकान में कभी कुछ खरीदता
कभी कुछ बेचता है
कभी कोने में पडी बेंच पर
थोड़ा सो लेता है
और फिर अचानक से उठकर
इधर उधर देखता है
एक ख़याल मिलता है दुसरे खयालों से
और खुश हो लेता है
मुस्कराता है कभी सिर्फ
कभी बोल भी लेता है

एक ख़याल है
जो बैठ कर सुबह शाम
कागजों पर अपनी तस्वीरें उकेरता रहता है
कुछ पूरी तस्वीरें कुछ अधूरी
और कुछ ऐसी जिन्हें वो फाड़ कर फेंक देता है
उठकर एक कोने में जाता है
सोचता है कुछ
कभी चाय के प्याले साथ
एक ख़याल गरमाता है कहीं
थोड़ी ही देर में
फिर वही
दौड़ भाग
वही धक्के देकर आगे बढती भीड़
वही शोर
वही बातें
वही झगडे रोज़ के
वैसे ही लफ्ज़
वही किताबें
वही अखबार
और उसमे छपी वही ख़बरें
पेट भरने की जुगाड़
वक़्त भरने की कवायद

एक ख़याल है
दूसरों की जिंदगियों में झांकता
अपने आप से बचता हुआ
दूसरों के ख्यालों में मशरूफ
तेज शोर में कुछ झपकियाँ लेता हुआ

एक ख़याल है
जो थोड़ी देर में
बत्तियां बुझा देगा
बिखरे सपनो का तकिया बनाकर
अपनी चादर ओड़कर
सो जाएगा
और फिर से सपने बुनेगा
कल सुबह कुछ अलग होगी....

शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

सुबह हो रही है

मैं जाने कब तक भागता रहा
पूरी सुबह या पूरी दोपहर
मैं शहर की सडको पर
बदहवास सा
कभी किसी संकरी तो किसी चौड़ी सड़क पर
या कही सुनसान गलियों में
या भीड़ भरे बाजारों में
मैं ना जाने कब तक भागता रहा

जब शाम का धुन्दलाका छाने लगा
और मेरी साँसों का दम फूल गया
मैं रुक गया एक अनजान सी सड़क पर
सामने एक गड्डा था
और उसमे बारिश का पानी भरा था
और उस पानी में मेरा धुन्द्लाया सा
झुंझलाया सा अक्स
मैं ठहरा वह कुछ पल
पास एक घर की सीडियों पर
सर झुका कर मैं बैठ गया कुछ देर
और ये सोचने लगा
ये तलाश आखिर कहा तक ले जाएगी
और ये भागना कब तक होगा
अँधेरा और छाने लगा
चारो तरफ साए मंडराने लगे
अनजान चेहरे ….अनजान रास्ते
और उनसे भी अनजान मंजिले
कौन क्या जानता है और किसको पहचानता है

सवाल तो सबके अपने होते हैं
पर क्या जवाब भी
सब अपने ढून्ढ पाते हैं

मैं रात वही सीडियों पर बैठा हुआ
सो गया
सपने में लोग दिखे
लोग जिन्हें जाना जिनसे मिले
जिनसे दोस्त बनाये और जिन पर जी भर कर झल्लाए
और भी लोग मिले
अलग अलग रंग के
अलग अलग ढंग के
सब के सब मेरी तरफ ही देख रहे थे
और मैं उन्हें देख कर
जिंदगी भर के गुबार निकालता रहा
और वो सब सुनते रहे
पर कोई कुछ महसूस ही नहीं कर पाया
चेहरे पर एक शिकन भी नहीं आया
जैसे कोई पागल चीख रहा हो
पर उसकी बातो का कोई मतलब नहीं होता
क्यूंकि उसका अंतर संतुलित नहीं है
और दुनिया तो संतुलन चाहती है
अब वो कहा से लाया जाए
अब मैं पहले सा
उनकी आँखों में नहीं देखता
पहले की तरह उन पर चीखता भी नहीं
मैं आगे बढता हूँ
तो सामने सीडियों पर से तैर कर ऊपर छत पर चदता हूँ
वहाँ ऊपर खुला आसमान है
कुछ फूलो से भरे गमले है
अलग अलग रंग के
अलग अलग ढंग के
वहाँ चारों तरफ और कुछ नहीं है
बस एक पुराना पीपल का पेड़ है
एक उजड़ा हुआ सा जंगल है

और जिस घर की छत पर मैं खड़ा हूँ
वो मेरा ही तो घर है
मेरी आँख खुलती है
और
मैं सीडियों पर से उठता हूँ
सुबह हो रही है
6 बजने में बस कुछ ही मिनट बाकी है

मैं दरवाजे की तरफ पलटकर अपनी जैबे टटोलता हूँ
उसमे घर की चाबियाँ हैं …

सागर

मैं तेरे किनारों पर
रेत की तरह बिखरा पड़ा हूँ
मेरा समुंदर
मुझे अपनाने से इनकार कर चुका है
मैं उसके सामने रोया
गिड़गिडाया
मैंने कहा
मुझे अपना वजूद तो देदे मेरे सागर
मुझे तू सीप बना
या मोती बना
या तेरे अंदर रहने वाली एक मछली बना ले
मुझे तू तेरे अंदर घुले हुए नमक का एक रेशा बना ले
मुझे यूँ किनारों पर तड़पते हुए न छोड़ ए सागर
मुझे तू अपना बना ले

मगर मेरा सागर बहुत हठी है
वो मुझे अपने सामने टूटकर बिखरते हुए देखना चाहता है
वो मुझे अपनी लहरों के जरिये
कभी कभी
मेरे पास आकर
और फिर असहाय सा छोड़ कर
दूर चला जाता है
और मैं यहाँ उसके किनारों पर
हतप्रभ
हताश
ये खेल देखता हूँ
हर रोज़
हर पल
और अपना किरदार निभाता हूँ
पूरी ईमानदारी से
उसकी लहरें जब हाथ बढाती है तो मैं भी
खुश होकर
बढ़ देता हूँ उसकी ओर
पर अगले ही पल
खीच लेता है वो अपने हाथ
और हँसता है अपनी क्रूर विजयी हंसी
और मैं हतप्रभ सा वही सिमट कर
खड़ा रह जाता हूँ

ए सागर
कभी तो एक ऐसी लहर भेज
कि मैं तेरी गहरारियो तक पहुच सकूँ
तुझे पा सकूँ
तुझे अपना सकूँ
तुझमे समा सकूँ
तेरे कुछ राज मैं जानूं
और कुछ अपने तुझे बता सकूँ
ए सागर
कभी तो एक लहर ऐसी भेज
मुझे ये अपने किनारों पे
निर्वासन की सजा मत दे
मैं बहुत दूर से चलकर तेरे पास आया हूँ
मेरा ये सफ़र अधूरा न रहे

राह का पत्थर

मैं राह के पत्थर सा वहाँ बैठा रहा
जब हवाओं में घुली धुंधलाती रोशनियों में
ऊपर को उठाठे धूल के गुबार
जैसे जैसे एक पेड़ के पत्तों को कैद कर उन पर जमा होने लगे
कुछ ख़याल मेरे सिरहाने एक गुमसुम सा शोर करते सुस्ताने लगे

मैं बैठा रहा कुछ न देख सक कर भी सब कुछ देखते हुए
वहाँ मैंने देखे ...दो पैर दो पेडल ....कुछ हवा का धक्का ...
और दो पहिये ..
एक साथ आगे बड़ते हुए ..
उन्मुक्त ...और आज़ाद ..
मेरे ख़याल भी उठे और उसके पीछे चल दिए
कुछ दूर कुछ कदम ...
दोनों ने एक दूसरे की आँखों में देखा
और आँखों में ही मुस्कराए
जैसे एक राह मिली हो ...

जैसे ही कदम और आगे रखे
कुछ अनजाने रास्ते भी मुझे देख कर मुस्कराए
वहाँ बिखरे पत्तों ने अपनी सरसरात से मेरा इस्तकबाल किया
मैं उन रास्तों की गुंजन को खुद में कैद करता आगे बढ गया
कभी कुछ गुनगुना सकने के वास्ते..
पीछे एक वीरान सड़क ...
आगे एक लम्बा रास्ता ..
जैसे सदियाँ गुजरी हो...

साइन बोर्ड



एक बड़ा सा साइन बोर्ड है 


एक  मशरूफ सी सड़क के किनारे पर 


जिस पर लटकी हुयी है एक ज़िन्दगी 


एक रस्सी के सहारे 


वो वहाँ पर एक इश्तेहार लगा रही है 


एक हवा से बातें करने वाली गाडी का 


और मैं पशो पेश में 


समझ नहीं आता 


किस तरफ देखा जाए 


हवा में कलाबाजियां खाती जिंदगी को 


या इश्तेहार में छपी 


रुकी हुयी सपनो की उड़ान को 


नीचे सड़क के कोलाहल को 


या ऊपर स्वच्छंद आसमान को 


कंक्रीट की बनी सडको पर दोडूं



या देखू हजारों मीलों दूर जगमगाते पत्थरों को

या आँखें बंद करूँ बस और

पा लूँ एक जिंदगी यहाँ भी और एक जिंदगी की दौड़ वहाँ भी...


कुछ सवाल


कुछ सवाल खड़े हैं अनसुलझे से
ट्रैफिक की लाल बत्ती पर थामे हुए
पथराई आंखों पर आंसू जैसे जमे हुए
कुछ सवाल खड़े हैं
साइन बोर्ड पर लगे इश्तिहारों से झांकते हुए
फुटपाथ पर बैठे भिखारी की तरह धुएँ को फांकते हुए
कुछ सवाल खड़े हैं
कुछ खड़े हैं इन्तेजार की लम्बी लाइन में
कुछ बैठ गए हैं थक कर छाया का रुख किए हुए
कुछ लगा रहे हैं नारे जवाबों के लिए
कुछ खामोशी से सब्र का बाँध थामे हुए
कुछ चढ़ उतर रहे हैं सीडियां बेचैनी से
कुछ बने हुए हैं उनकी सीडियां दर्द पीते हुए
कुछ खड़े हुए हैं दुकानों के अन्दर भीगने के डर से
कुछ जल्द से जल्द घर पहुचने को दौड़ते हुए
कुछ दिख जाते हैं आँखे मिलाते आईने में
कुछ अपने ही जवाबों से बचकर नजरें झुकाए हुए
कुछ दिन भर के काम से थक कर निढाल हो लिए
कुछ लगे हुए हैं कागज़ कलम लिए अपने जवाब ख़ुद लिखते हुए
कुछ फुटपाथ पर पड़े हुए जी रहे हैं अर्थहीन सा जीवन
कुछ बीच सड़क पर सरपट भागते अचानक मरते हुए
कुछ सड़क से काटकर जाती अँधेरी गली में खो जाते हैं
कुछ रौशनी में धब्बे नुमा परछाई की तरह तैरते हुए
जिधर भी नजर जाती है सिर्फ़ सवाल दिखायी देते हैं
पर सब के सब बगैर जवाबों के समय की धार पर अटके हुए...............

हाँ बिल्कुल यही


अँधेरी ठंडक फैली हुई है अंदर
कोने में छिपकर बैठा है उजाले का एक कतरा
सहमी आंखों से देख रहा है
अपने भीतर समाते अंधेरे को
उठकर जब वो चला खिड़की की तरफ़ बाहर झाँकने
कुछ देख ना सका
क्यूंकि बाहर भी सिवाय अंधेरे के कुछ नहीं था
घबराकर अपने स्त्रोत हीन होने के डर से
उसने ऊपर नीचे दायें बाएँ सब तरफ़ खोजा
कि आख़िर उसके अस्तित्व कि वजह कहाँ है
कहाँ है प्रकाश का वो अप्रतिम स्त्रोत
जिससे काटकर वो यहाँ आया
पर सभी दरवाजे, सभी खिड़कियाँ
सिर्फ़ अंधेरे में ही खुलते थे
और शायद जो रास्ते उनसे निकलते थे वो भी
अंधेरों से ही भरे थे
पर कोई शक्ति थी जिससे वो धीरे धीरे आगे सरक रहा था
शायद वो समय था
जो उसे आगे खींच रहा था
पर अपनी पहचान से बेखबर रौशनी का वो कतरा
जैसे बैदियों में जकडा था
अनजान अपनी जड़ों से और अपने हुनर से
क्यूंकि अपने स्त्रोत को छोड़कर वो सीख नहीं पाया
की वो स्वयं ही अंधेरे को मिटा सकता है
जो वो बैठा है संकुचित सा अंधेरे में डरकर
अगर चाहे तो अपना विस्तार कर सकता है
अगर वो देख सके उस किरण को जिसके सहारे
उसने प्रवेश किया था इस अंधेरे कमरे में
तो शायद वो पा सकेगा अपने स्त्रोत को
अपने जन्मदाता को
जिसकी उसे सिर्फ़ एक धुंधली सी याद है
कभी पल रहा था वो एक स्नेहिल गोद में
पल रहा था मगर एक मकसद आहिस्ता आहिस्ता
उसकी चमकती आंखों में
शायद उसी लक्ष्य को पाने को
निकला था वो उस दुर्ग से
पर रास्ते बनाते बनाते वो जल्दी ही थकने लगा
भूल अपने शौर्य को वो किस्मत को रोने लगा
और जैसे ही बैठा था वो सुस्ताने जरा
उसकी किरण ने उसे छोड़ दिया
अब वो बैठा है वहीँ
मार्ग हीन उपाय विहीन
बस टिमटिमाती आंखों से कभी कभी
खोजने लगता है आसपास घिर आई दीवारों में
वो एक दर्रा बस एक दर्रा
जो उसे यहाँ ले आया था
शायद जिसके सहारे वो वापस चला जाए
पर तभी एक प्रश्न कोंधा
क्या ये सही होगा??
कुछ पल उसने सोचा फ़िर अचानक जैसे
कुछ निश्चय उभरा उसके मन में
हाँ बिल्कुल यही
बिल्कुल यही
वो वापस नही जाएगा
बल्कि ढूँढेगा उस अजस्त्र धारा को
जिससे बह रही हैं करोंडों रश्मियाँ
और यहाँ फैले अंधेरे का अंत करने को
वो लेकर आएगा अपने साथ उन्हें
और फ़िर कभी वो रौशनी का कतरा
ऐसे अंधेरों में फसकर नहीं घबराया
और ना ही सिमटा अपने आप में
वो हुआ और भी विस्तृत और भी अपार
और जैसे अंधेरे से उसका ये संग्राम वो फ़िर से जीत गया
हाँ बिल्कुल यही
बिल्कुल यही