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रविवार, 13 सितंबर 2015

सच कहूँ ?

सोचता हूँ,
थमता हूँ,
सोचता हूँ,
थमता हूँ,
सोच पर पहरे लगे हैं,
लिखता हूँ,
तो कलम रूकती है,
ठिठकती है,
सच लिखूं ?
सच पढोगे ?
सच कहूँ ?
सच सुनोगे ?
सच पूछूं ?
सच बोलोगे ?
सच तो ये है कि
हम सच सुनना भूल गए,
सच सफ़ेद है, या झूठ काला है
जिसने गोली मारी, वो तालिबान,
जिसने गोली खायी, वो मलाला,
पर गोली मारने वाली सरकारों,
और सरकारी मुलाजिमों को फेहरिस्त में कौन लेगा ?
गोली खाने वाले मासूमों की गिनती
शुरू कब  होगी ?
गोली मारने वाले कब पैदा हुए,
उनको किसने पाला पोसा,
इसका हिसाब होगा ?
मुआवजे से जिंदगी का हिसाब,
किसने  और कैसे किया ?
और मुआवजा बांटने वाले कौन थे ?
सच के सिपहसालार थे,
या किसी के कंधे पर रख कर,
बंदूके गोलियां चलाने वाले थे ?
सच बोलने वाले कौन थे ?
उन्हें देखा कभी ?
उन्हें कन्धों पर उठाया था, जब वो ज़िंदा थे ?
या ये दिन उनके मरने  के बाद ही हमने
उनके जनाज़े पर देखा था ?
सच सफ़ेद, झूठ काला है
झूठ कहूँ, तो झूठ तुम सुनोगे,
झूठ लिखूं, तो झूठ तुम पढ़ोगे,
झूठ ही बोलूं, तुम झूठ ही समझोगे !