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रविवार, 30 सितंबर 2012

लोग आ रहे हैं...

ये कहाँ से इतने लोग चले आ रहे हैं
सरों पर गठरियाँ उठाये
न जाने कहाँ से लोग चले आ रहे हैं
औरतें
छोटी, बड़ी और बूढी
और मर्द भी
कुछ आगे कुछ पीछे
कुछ साथ में
और बच्चे
कतारों में लगे
न जाने कहाँ से लोग
चले आ रहे हैं
कुछ उठाये हुए हैं झंडे
कुछ हाथों में बैनर लिए आ रहे हैं
आँखों में कुछ उदासी
एक शिकायत
तो कुछ जोश लिए आ रहे हैं
अपनी जमीनों से दूर
अपनी जमीनों का हक पाने
अविरल पानी से बहते
जाने कहाँ कहाँ से लोग चले आ रहे हैं
कितने दिनों के चलते चलते
कुछ थके कुछ हारे फिर भी चलते
कुछ खाने का सामान साथ लिए
कितने दिनों के घर से निकले
जलते हुए गले
जलते हुए पैरों को आगे बढ़ाते
जलते हुए सपनों के सहारे
हज़ारों लोग
बस इसी दिशा में
बढे आ रहे हैं...

बुधवार, 19 सितंबर 2012

दस्तक दिए बगैर चला आता है कोई

मेरे घर के दरवाजे पर कोई
दस्तक दिए बगैर चला आता है
फेंकता है कुछ सामान इधर उधर
और खाली दीवारों को घूरता है देर तक

मेरी मेज पर बिखरी किताबों को
उलट पलट कर
ढूंढता है कुछ कोई
मेरी एक आधी पढ़ी किताब को खोल कर
उसे वहीँ बीच से पढने लगता है

मेरी खिड़की से बाहर झाँक रहा है कोई
बारिश में भीगे हवा के झोंके
उसके चेहरे को थपकियाँ देते हैं
गम सुम बूंदों की खुशबू को समेटने को
उसने अपनी बाहें फैला ली हैं

मेरे बिस्तर पर लेटा है
बेसुध सा सोया कोई
मैं उसके थके चेहरे पर खिची लकीरें पढता हूँ
माथे की सिलवटों से शिकन छांटता हूँ

मेरे आईने से देखता है मेरी आँखों में कोई
मैं उस अनजान चेहरे को पहचानने की कोशिश में
अपनी उँगलियाँ आईने में बने अक्स पर फेरता हूँ
वो मैं ही हूँ

बुधवार, 12 सितंबर 2012

न्यूक्लीयर विष

खबर है
सागर मंथन की कल फिर से
एक छोटे से गाँव में बसने वाले
साधारण जन
क्या मथ पाएंगे अमृत
या सागर उगलेगा
न्यूक्लीयर विष
और तहस नहस कर देगा
लोगों के लिए
लोगों के द्वारा
लोगों का
कहा जाने वाला लोकतंत्र!!!

बुधवार, 5 सितंबर 2012

आखिरी मुलाक़ात

देखा था उसे आखिरी बार
एक नदी के किनारे पर खड़े हुए
एक महानगर में बहती हुयी नदी
अपने अस्तित्व को बचाती
जूझती नदी
जो पहुची थी यहाँ
न जाने कितने पहाड़ों को पार करती
एक गूंज थी उसमे
जब वो पहुची थी यहाँ कलकल करती हुयी
पर शहर की सडको से गुजरकर
उसकी हवा में साँसे लेकर
उसका दम घुटने लगा
जो कारवां सागर तक जाना था
वो बीच सफ़र में दम तोड़ने लगा
उसी नदी के किनारे पर
खड़े हुए देखा था उसे आखिरी बार

मैंने जब आगे बढकर
उसके कंधे पर हाथ रखा
चोंक कर देखा था उसने पलटकर
उसकी आँखों में उस मरती हुयी नदी की
छाया बसी थी
जिसे देख कर दहशत सी होने लगी
मेरे कुछ कहने से पहले ही
वो बोल पड़ी
तुम्हे यहाँ नहीं आना था
और ये कहते हुए उसकी आँखे
सुदूर आसमान में
बिखरे बादलों के एक टुकड़े पर जाकर रुक गयी
फिर उसने कुछ कहा
और कहते कहते वो मुझसे दूर चलती गयी
हम दोनों कितने एक जैसे लगते है न
ये नदी और मैं
अपने अंदर सब कुछ समेटते हुए
बस हम आगे बढते रहे
हम दोनों
पर अब लगता है जैसे
साहस नहीं रहा
ये हवाएं दम क्यूँ घोटने लगी हैं
हम अब अतीत की छाया बन कर रह गए है
अपने अवसान की ओर अग्रसर हम दोनों
एक ही अंत की ओर बढ रहे हैं
उसकी आँखों में एक वहशत सी थी
मैंने उसे पुकारा फिर से
पर वो नहीं रुकी
बस वही सुने थे
उसके आखिरी शब्द
और आखिरी बार उसे वही देखा था....