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शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

सुबह हो रही है

मैं जाने कब तक भागता रहा
पूरी सुबह या पूरी दोपहर
मैं शहर की सडको पर
बदहवास सा
कभी किसी संकरी तो किसी चौड़ी सड़क पर
या कही सुनसान गलियों में
या भीड़ भरे बाजारों में
मैं ना जाने कब तक भागता रहा

जब शाम का धुन्दलाका छाने लगा
और मेरी साँसों का दम फूल गया
मैं रुक गया एक अनजान सी सड़क पर
सामने एक गड्डा था
और उसमे बारिश का पानी भरा था
और उस पानी में मेरा धुन्द्लाया सा
झुंझलाया सा अक्स
मैं ठहरा वह कुछ पल
पास एक घर की सीडियों पर
सर झुका कर मैं बैठ गया कुछ देर
और ये सोचने लगा
ये तलाश आखिर कहा तक ले जाएगी
और ये भागना कब तक होगा
अँधेरा और छाने लगा
चारो तरफ साए मंडराने लगे
अनजान चेहरे ….अनजान रास्ते
और उनसे भी अनजान मंजिले
कौन क्या जानता है और किसको पहचानता है

सवाल तो सबके अपने होते हैं
पर क्या जवाब भी
सब अपने ढून्ढ पाते हैं

मैं रात वही सीडियों पर बैठा हुआ
सो गया
सपने में लोग दिखे
लोग जिन्हें जाना जिनसे मिले
जिनसे दोस्त बनाये और जिन पर जी भर कर झल्लाए
और भी लोग मिले
अलग अलग रंग के
अलग अलग ढंग के
सब के सब मेरी तरफ ही देख रहे थे
और मैं उन्हें देख कर
जिंदगी भर के गुबार निकालता रहा
और वो सब सुनते रहे
पर कोई कुछ महसूस ही नहीं कर पाया
चेहरे पर एक शिकन भी नहीं आया
जैसे कोई पागल चीख रहा हो
पर उसकी बातो का कोई मतलब नहीं होता
क्यूंकि उसका अंतर संतुलित नहीं है
और दुनिया तो संतुलन चाहती है
अब वो कहा से लाया जाए
अब मैं पहले सा
उनकी आँखों में नहीं देखता
पहले की तरह उन पर चीखता भी नहीं
मैं आगे बढता हूँ
तो सामने सीडियों पर से तैर कर ऊपर छत पर चदता हूँ
वहाँ ऊपर खुला आसमान है
कुछ फूलो से भरे गमले है
अलग अलग रंग के
अलग अलग ढंग के
वहाँ चारों तरफ और कुछ नहीं है
बस एक पुराना पीपल का पेड़ है
एक उजड़ा हुआ सा जंगल है

और जिस घर की छत पर मैं खड़ा हूँ
वो मेरा ही तो घर है
मेरी आँख खुलती है
और
मैं सीडियों पर से उठता हूँ
सुबह हो रही है
6 बजने में बस कुछ ही मिनट बाकी है

मैं दरवाजे की तरफ पलटकर अपनी जैबे टटोलता हूँ
उसमे घर की चाबियाँ हैं …

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