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बुधवार, 22 अप्रैल 2015

खालीपन का शहर

धीरे धीरे खालीपन भरता रहा 
और देखते ही देखते 
खालीपन का एक पूरा शहर बन 
खड़ा हो गया 
शहर या जंगल 
जैसे जंगल के अनछुए रास्तों पर 
पगडंडियां नहीं होती 
वैसे ही इस खालीपन के शहर को 
मापने के वास्ते 
पगडंडियां अभी नहीं बनी 
और न ही कभी बनेंगी 
क्यूंकि खाली दिल 
कोई असर नहीं छोड़ते
वो हवा की तरह गुजर जाते हैं 
जो दिखती नहीं और न ही उसमे कोई महक होती है 
उसके होने का अहसास 
सिर्फ वो कर सकते हैं 
जो उसके रास्ते में 
खड़े हो जाते हैं 
पर शहर अभी खाली है 
और यहाँ की हवा 
बेरोक-टोक सांय सांय 
कर रही है 
कोई सुनने वाला भी नहीं 
कोई देखने वाला भी नहीं 
न कोई रास्ता 
न कोई मंजिल 
खालीपन का ये शहर 
अपनी बाहें पसारे 
खाली आसमान की ओर 
उम्मीद भरी निगाहों से देखता है 
न जाने कहाँ गया वो चाँद 
और कहाँ ग़ुम हो गए सितारे
शहरों की इमारतों से हमने 
पेड़ों के झुरमट को बदल लिया 
अब कहाँ का चाँद 
और कहाँ के सितारे  | 

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