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बुधवार, 5 सितंबर 2012

आखिरी मुलाक़ात

देखा था उसे आखिरी बार
एक नदी के किनारे पर खड़े हुए
एक महानगर में बहती हुयी नदी
अपने अस्तित्व को बचाती
जूझती नदी
जो पहुची थी यहाँ
न जाने कितने पहाड़ों को पार करती
एक गूंज थी उसमे
जब वो पहुची थी यहाँ कलकल करती हुयी
पर शहर की सडको से गुजरकर
उसकी हवा में साँसे लेकर
उसका दम घुटने लगा
जो कारवां सागर तक जाना था
वो बीच सफ़र में दम तोड़ने लगा
उसी नदी के किनारे पर
खड़े हुए देखा था उसे आखिरी बार

मैंने जब आगे बढकर
उसके कंधे पर हाथ रखा
चोंक कर देखा था उसने पलटकर
उसकी आँखों में उस मरती हुयी नदी की
छाया बसी थी
जिसे देख कर दहशत सी होने लगी
मेरे कुछ कहने से पहले ही
वो बोल पड़ी
तुम्हे यहाँ नहीं आना था
और ये कहते हुए उसकी आँखे
सुदूर आसमान में
बिखरे बादलों के एक टुकड़े पर जाकर रुक गयी
फिर उसने कुछ कहा
और कहते कहते वो मुझसे दूर चलती गयी
हम दोनों कितने एक जैसे लगते है न
ये नदी और मैं
अपने अंदर सब कुछ समेटते हुए
बस हम आगे बढते रहे
हम दोनों
पर अब लगता है जैसे
साहस नहीं रहा
ये हवाएं दम क्यूँ घोटने लगी हैं
हम अब अतीत की छाया बन कर रह गए है
अपने अवसान की ओर अग्रसर हम दोनों
एक ही अंत की ओर बढ रहे हैं
उसकी आँखों में एक वहशत सी थी
मैंने उसे पुकारा फिर से
पर वो नहीं रुकी
बस वही सुने थे
उसके आखिरी शब्द
और आखिरी बार उसे वही देखा था....

6 टिप्‍पणियां:

  1. Hum to apke Diwane ho gaye :) Cheese lines but what can I say I truly have become your fan

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  2. Thanks Sumit for coming to the blog and appreciating it... :) :) and yeah very filmy lines as well... :) :D

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  3. Hey Ankita

    WoW!Its so profound. Beautiful.

    Keep rejuvenating us with your poetry.

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  4. Thank you so much Nayera for visiting the blog, appretiating the poetry and your motivation :)i am really glad that you liked it... :)

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  5. Anki... You n ur poetry has evolved magnificently wd tym... Sorry for visiting d blog after soo long tym but every bit of it was a treat to d mind heart n soul... Keep up d new one's coming !!!

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  6. Thanks latika...yeah hope to keep on learning and improving.. :)

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