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मंगलवार, 20 नवंबर 2012

मेरी नीले तिरपाल की झोपडी के पीछे

सरकार जहां आज आपकी चमचमाती गाड़ियां दौड़ा करती हैं

वहाँ मैं अपनी जिंदगी की छोटी छोटी खुशियों की खेती करता था

और वहाँ एक दिन मेरे खेत लहलहाया करते थे

अब मैं रहता हूँ एक झुग्गी झोपडी वाली बस्ती में

जहां शहर की सड़कें मुड़कर संकरी गलियों में तब्दील हो जाती हैं

और एक नाला बहता है मेरी नीले तिरपाल की झोपडी के पीछे

जिसमे पानी लिजलिजाता है बिलकुल इस काली सड़क के रंग का

आपकी गाडी को धोता हूँ मैं एक घंटे रोजाना

पाइप से निकलती सफ़ेद तेज़ धार से

मेरी पत्नी रोज तीन घंटे इन्तेजार की कतार में खड़ी होकर

पीले रंग का पानी भरकर लाती है

जिससे मेरे परिवार में खाना बनता है

जो ये एक अकेला नीम का पेड़ देख रहे हैं सड़क के किनारे

इस पेड़ के छाया में बैठ कर

मैं कभी सुकून से रोटी प्याज खा लेता था

अब मैं इस नीम के पेड़ की हवा को याद करता हूँ

क्यूँकि मेरी झोपडी में पीछे बहते नाले से सडाँध आती है।

6 टिप्‍पणियां:

  1. एकदम अलग तरह का ब्लॉग जिसमे नयी रचनाओं का स्वरुप दिखा ,पढ़कर बढियां लगा ,भावपूर्ण रचना ।

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  2. These are really wonderful,
    heart-touching lines..!!

    After any Land acquisition, a proper rehabilitation should be on very first priority.

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  3. Thank u so much tripathiji for your appreciation and motivation...

    @nikhil....thanks dear for coming to blog and read it.. :)

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  4. बहुत अच्छी रचना....
    आप अच्छा लिखती हैं.

    अनु

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  5. thanks rashmi ji for adding my poem in your collection. it indeed motivates me.
    thank u anu ji for visiting the blog and your appreciation. keep coming back.. :)

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