जब मैं बहुत छोटा सा था
मेरी माँ ने एक बार
आसमान की और इशारा कर दिखाया था
कि उसके आँचल का रंग था
आसमान के रंग जैसा ही
तब मैं समझा था
कि मेरी माँ के आँचल का एक टुकडा
ऊपर उड़कर आसमान बन गया है
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रविवार, 19 अगस्त 2012
शुक्रवार, 17 अगस्त 2012
बुखार
रात उसे तेज़ बुखार चढ़ा
शरीर का हर हिस्सा चरमरा उठा
तब उसे घर याद आया
माँ की थपकियाँ याद आई
रात भर नींद से खाली
फिक्र भरी उसकी आँखें याद आई
उसने सभी खिड़कियाँ बंद कर ली
परदे भी उसने खींच लिए
की कहीं से कोई रौशनी न आ जाए
सारी बत्तियां बुझा कर
रात भर वो गरम साँसे उडेलता रहा अपने तकिये पर
रात गुजरी
पर सुबह का कहीं अता पता नजर न आया
कमरे का अन्धेरा चुप चाप उसे देखता रहा
सूरज ने कोशिश की खिड़की से झाँकने की
तो उसने मुंह फेर लिया
दिन चढ़ा
बुखार भी चढ़ा रहा
कुछ भूख चढी
पर नींद का खुमार भी चढ़ा रहा
वो याद करता रहा
गुजरे दिन, वाकये, शहर और लोग
एक वीरान पहाड़
बुखार में तपते कुछ लफ्ज़
गूंजते हैं घाटी में
कुछ पल
फिर सन्नाटा साँय साँय करता है
एक छाया पलटकर पीछे देखती है
दूसरी छाया को
लफ्ज़ गूंजते है फिर
और कुछ कहकहे सुनाई देते है
सन्नाटा फिर साँय साँय करता सुनाई पड़ता है
वो बुखार में तड़पता सन्नाटे की घुटन से बचता हुआ
अपने कानो पर हाथ रखता है
रात पसीने से तरबतर बदन
वो अचानक घबरा कर उठ बैठा
बुखार न था
पर खुमारी अब भी थी...
शरीर का हर हिस्सा चरमरा उठा
तब उसे घर याद आया
माँ की थपकियाँ याद आई
रात भर नींद से खाली
फिक्र भरी उसकी आँखें याद आई
उसने सभी खिड़कियाँ बंद कर ली
परदे भी उसने खींच लिए
की कहीं से कोई रौशनी न आ जाए
सारी बत्तियां बुझा कर
रात भर वो गरम साँसे उडेलता रहा अपने तकिये पर
रात गुजरी
पर सुबह का कहीं अता पता नजर न आया
कमरे का अन्धेरा चुप चाप उसे देखता रहा
सूरज ने कोशिश की खिड़की से झाँकने की
तो उसने मुंह फेर लिया
दिन चढ़ा
बुखार भी चढ़ा रहा
कुछ भूख चढी
पर नींद का खुमार भी चढ़ा रहा
वो याद करता रहा
गुजरे दिन, वाकये, शहर और लोग
एक वीरान पहाड़
बुखार में तपते कुछ लफ्ज़
गूंजते हैं घाटी में
कुछ पल
फिर सन्नाटा साँय साँय करता है
एक छाया पलटकर पीछे देखती है
दूसरी छाया को
लफ्ज़ गूंजते है फिर
और कुछ कहकहे सुनाई देते है
सन्नाटा फिर साँय साँय करता सुनाई पड़ता है
वो बुखार में तड़पता सन्नाटे की घुटन से बचता हुआ
अपने कानो पर हाथ रखता है
रात पसीने से तरबतर बदन
वो अचानक घबरा कर उठ बैठा
बुखार न था
पर खुमारी अब भी थी...
रविवार, 12 अगस्त 2012
खिड़की के इस पार
एक खिड़की है...
और बाहर आधा कटा आसमान है...
कुछ दरख़्त है...
कुछ दीवारें...
कुछ छतें...
खिड़की के इस पार दो आँखें हैं...
एक फ़ोन...
एक इंतज़ार...
एक कप काफ्फी...
और एक आधी पढ़ी किताब है...
मंगलवार, 7 अगस्त 2012
एक ख़याल है
एक ख़याल है
जो सुबह को बड़ी
मुश्किलों से जागता है
चादर से फिर वो अपनी
कुछ सपनो को झाड़ता है
अनमनाया सा
उठ कर चल देता है फिर
बाहर की दुनिया में
हज़ारों की भीड़ में धक्के खाता
नींद भरी उबासियाँ भरता हुआ
कभी खडा होता कभी बैठता
कभी चलता कभी दौड़ता
पहुचता है कभी वक़्त पर
तो कभी देर से
एक दुकान में कभी कुछ खरीदता
कभी कुछ बेचता है
कभी कोने में पडी बेंच पर
थोड़ा सो लेता है
और फिर अचानक से उठकर
इधर उधर देखता है
एक ख़याल मिलता है दुसरे खयालों से
और खुश हो लेता है
मुस्कराता है कभी सिर्फ
कभी बोल भी लेता है
एक ख़याल है
जो बैठ कर सुबह शाम
कागजों पर अपनी तस्वीरें उकेरता रहता है
कुछ पूरी तस्वीरें कुछ अधूरी
और कुछ ऐसी जिन्हें वो फाड़ कर फेंक देता है
उठकर एक कोने में जाता है
सोचता है कुछ
कभी चाय के प्याले साथ
एक ख़याल गरमाता है कहीं
थोड़ी ही देर में
फिर वही
दौड़ भाग
वही धक्के देकर आगे बढती भीड़
वही शोर
वही बातें
वही झगडे रोज़ के
वैसे ही लफ्ज़
वही किताबें
वही अखबार
और उसमे छपी वही ख़बरें
पेट भरने की जुगाड़
वक़्त भरने की कवायद
एक ख़याल है
दूसरों की जिंदगियों में झांकता
अपने आप से बचता हुआ
दूसरों के ख्यालों में मशरूफ
तेज शोर में कुछ झपकियाँ लेता हुआ
एक ख़याल है
जो थोड़ी देर में
बत्तियां बुझा देगा
बिखरे सपनो का तकिया बनाकर
अपनी चादर ओड़कर
सो जाएगा
और फिर से सपने बुनेगा
कल सुबह कुछ अलग होगी....
शुक्रवार, 3 अगस्त 2012
सुबह हो रही है
मैं जाने कब तक भागता रहा
पूरी सुबह या पूरी दोपहर
मैं शहर की सडको पर
बदहवास सा
कभी किसी संकरी तो किसी चौड़ी सड़क पर
या कही सुनसान गलियों में
या भीड़ भरे बाजारों में
मैं ना जाने कब तक भागता रहा
जब शाम का धुन्दलाका छाने लगा
और मेरी साँसों का दम फूल गया
मैं रुक गया एक अनजान सी सड़क पर
सामने एक गड्डा था
और उसमे बारिश का पानी भरा था
और उस पानी में मेरा धुन्द्लाया सा
झुंझलाया सा अक्स
मैं ठहरा वह कुछ पल
पास एक घर की सीडियों पर
सर झुका कर मैं बैठ गया कुछ देर
और ये सोचने लगा
ये तलाश आखिर कहा तक ले जाएगी
और ये भागना कब तक होगा
अँधेरा और छाने लगा
चारो तरफ साए मंडराने लगे
अनजान चेहरे ….अनजान रास्ते
और उनसे भी अनजान मंजिले
कौन क्या जानता है और किसको पहचानता है
सवाल तो सबके अपने होते हैं
पर क्या जवाब भी
सब अपने ढून्ढ पाते हैं
मैं रात वही सीडियों पर बैठा हुआ
सो गया
सपने में लोग दिखे
लोग जिन्हें जाना जिनसे मिले
जिनसे दोस्त बनाये और जिन पर जी भर कर झल्लाए
और भी लोग मिले
अलग अलग रंग के
अलग अलग ढंग के
सब के सब मेरी तरफ ही देख रहे थे
और मैं उन्हें देख कर
जिंदगी भर के गुबार निकालता रहा
और वो सब सुनते रहे
पर कोई कुछ महसूस ही नहीं कर पाया
चेहरे पर एक शिकन भी नहीं आया
जैसे कोई पागल चीख रहा हो
पर उसकी बातो का कोई मतलब नहीं होता
क्यूंकि उसका अंतर संतुलित नहीं है
और दुनिया तो संतुलन चाहती है
अब वो कहा से लाया जाए
अब मैं पहले सा
उनकी आँखों में नहीं देखता
पहले की तरह उन पर चीखता भी नहीं
मैं आगे बढता हूँ
तो सामने सीडियों पर से तैर कर ऊपर छत पर चदता हूँ
वहाँ ऊपर खुला आसमान है
कुछ फूलो से भरे गमले है
अलग अलग रंग के
अलग अलग ढंग के
वहाँ चारों तरफ और कुछ नहीं है
बस एक पुराना पीपल का पेड़ है
एक उजड़ा हुआ सा जंगल है
और जिस घर की छत पर मैं खड़ा हूँ
वो मेरा ही तो घर है
मेरी आँख खुलती है
और
मैं सीडियों पर से उठता हूँ
सुबह हो रही है
6 बजने में बस कुछ ही मिनट बाकी है
मैं दरवाजे की तरफ पलटकर अपनी जैबे टटोलता हूँ
उसमे घर की चाबियाँ हैं …
पूरी सुबह या पूरी दोपहर
मैं शहर की सडको पर
बदहवास सा
कभी किसी संकरी तो किसी चौड़ी सड़क पर
या कही सुनसान गलियों में
या भीड़ भरे बाजारों में
मैं ना जाने कब तक भागता रहा
जब शाम का धुन्दलाका छाने लगा
और मेरी साँसों का दम फूल गया
मैं रुक गया एक अनजान सी सड़क पर
सामने एक गड्डा था
और उसमे बारिश का पानी भरा था
और उस पानी में मेरा धुन्द्लाया सा
झुंझलाया सा अक्स
मैं ठहरा वह कुछ पल
पास एक घर की सीडियों पर
सर झुका कर मैं बैठ गया कुछ देर
और ये सोचने लगा
ये तलाश आखिर कहा तक ले जाएगी
और ये भागना कब तक होगा
अँधेरा और छाने लगा
चारो तरफ साए मंडराने लगे
अनजान चेहरे ….अनजान रास्ते
और उनसे भी अनजान मंजिले
कौन क्या जानता है और किसको पहचानता है
सवाल तो सबके अपने होते हैं
पर क्या जवाब भी
सब अपने ढून्ढ पाते हैं
मैं रात वही सीडियों पर बैठा हुआ
सो गया
सपने में लोग दिखे
लोग जिन्हें जाना जिनसे मिले
जिनसे दोस्त बनाये और जिन पर जी भर कर झल्लाए
और भी लोग मिले
अलग अलग रंग के
अलग अलग ढंग के
सब के सब मेरी तरफ ही देख रहे थे
और मैं उन्हें देख कर
जिंदगी भर के गुबार निकालता रहा
और वो सब सुनते रहे
पर कोई कुछ महसूस ही नहीं कर पाया
चेहरे पर एक शिकन भी नहीं आया
जैसे कोई पागल चीख रहा हो
पर उसकी बातो का कोई मतलब नहीं होता
क्यूंकि उसका अंतर संतुलित नहीं है
और दुनिया तो संतुलन चाहती है
अब वो कहा से लाया जाए
अब मैं पहले सा
उनकी आँखों में नहीं देखता
पहले की तरह उन पर चीखता भी नहीं
मैं आगे बढता हूँ
तो सामने सीडियों पर से तैर कर ऊपर छत पर चदता हूँ
वहाँ ऊपर खुला आसमान है
कुछ फूलो से भरे गमले है
अलग अलग रंग के
अलग अलग ढंग के
वहाँ चारों तरफ और कुछ नहीं है
बस एक पुराना पीपल का पेड़ है
एक उजड़ा हुआ सा जंगल है
और जिस घर की छत पर मैं खड़ा हूँ
वो मेरा ही तो घर है
मेरी आँख खुलती है
और
मैं सीडियों पर से उठता हूँ
सुबह हो रही है
6 बजने में बस कुछ ही मिनट बाकी है
मैं दरवाजे की तरफ पलटकर अपनी जैबे टटोलता हूँ
उसमे घर की चाबियाँ हैं …
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